हमारे आस पास फैली हुई अव्यवस्थाओं के प्रति हमारे मन में जो आक्रोश व्याप्त है, वही व्यवस्थाएं जिनके नाकाफी होने के कारण हम केवल अपना मन मसोस कर रह जाते हैं, पर कर कुछ नहीं पाते..... कारण है.... हमारा, अपने आप को बेबस और लचर समझना.. हम कर तो बहुत कुछ सकते हैं, पर अपनी क्षमताओं और अधिकारों से अनजान हम कुछ करना नहीं चाहते, वरन कोसना जरूर जानते हैं.....
पर मैं यहाँ कहना चाहूँगा की, यहाँ कोसना ही आक्रोश को जन्म देता है, और जब हम उस आक्रोश को सही दिशा में ले जाते हैं तो कार्य की परिणति निश्चित ही उस अव्यवस्था का समूल नष्ट कर, कम से कम हमारे मन की संतुष्टि के लिए काफी होती है.
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